इस नई कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह है -
"रात भर मेह बरसा था। भोर में देखा तो सब तरफ़ जल-थल हो रहा था। धान की बेरन तैयार हो चुकी थी और उन्हें लगाने का समय हो चला था। तभी लाला बढ़ई ने आकर बताया की कनचोदा मर गया।
मैंने छाता लिया और कनचोदे के घर की तरफ़ चल पड़ा। झीसी पड़ रही थी। गलियां दलदली हो रही थीं। गाँव की औरतें पलरी में धान की बेरने लेकर खेतों की तरफ़ चली जा रही थीं...."
Thursday, July 23, 2009
Tuesday, July 14, 2009
नई कहानी
मेरी एक कहानी 'बुजरी' हंस के जुलाई २००९ के अंक में प्रकाशित हुई है। आप उसे पढ़ सकते हैं। उसके बाद मैं एक नई कहानी जल्द पेश करने वाला हूँ जिस पर काम लगभग समाप्त हो गया है। कहानी का शीर्षक है 'कनचोदा'।
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